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बौद्ध धर्म/Buddhism/ For All Govt Exam [cgl, chsl, cpo, tet, police, railway.....etc]

बौद्ध धर्म

● बौद्ध धर्म के संस्थापक गौतम बुद्ध थे| इन्हें एशिया का ज्योति पुंज(Light of Asia) कहा जाता है|
बुद्ध के जीवन से संबंधित बौद्ध धर्म के प्रतीक
घटना                               प्रतीक              
जन्म                             कमल एवं सांड
गृह त्याग                       घोड़ा
ज्ञान                      पीपल(बोधिवृक्ष)         
निर्वाण                          पदचिन्ह
मृत्यु                             स्तूप

● गौतम बुद्ध का जन्म 563 ईसा पूर्व में कपिलवस्तु के लुंबिनी नामक स्थान पर हुआ था|
● इनके पिता शुद्धोधन शाक्य गण के मुखिया थे|
● इनकी माता मायादेवी की मृत्यु इनके जन्म के सातवें दिन ही हो गई थी इनका लालन-पालन इनकी सौतेली मां प्रजापति गौतमी ने किया था|
● इनके बचपन का नाम सिद्धार्थ था|
● गौतम बुद्ध का विवाह 16 वर्ष की अवस्था में यशोधरा के साथ हुआ| इनके पुत्र का नाम राहुल था|
● सिद्धार्थ जब कपिलवस्तु की सैर पर निकले तो उन्होंने निम्न चार दृश्यों को क्रमश: देखा-
1. बुड्ढा व्यक्ति
2. एक बीमार व्यक्ति
3. शव
4. एक सन्यासी
● संसारिक समस्याओं से व्यथित होकर सिद्धार्थ ने 29 वर्ष की अवस्था में गृह त्याग किया, जिसे बौद्ध धर्म में महाभिनिष्क्रमण कहा गया है|
● गृह त्याग करने के बाद सिद्धार्थ(बुद्ध) ने वैशाली के आलारकलाम से सांख्य दर्शन की शिक्षा ग्रहण की| आलारकलाम सिद्धार्थ के प्रथम गुरु हुए|
● आलारकलाम के बाद सिद्धार्थ ने राजगीर के रुद्राकरामपुत्त  से शिक्षा ग्रहण की|
● उरुवेला में सिद्धार्थ को कौंडिन्य, वप्पा, भादिया, महानामा एवं अस्सागी नामक पांच साधक मिले|
● बिना अन्न जल ग्रहण किए 6 वर्ष की कठिन तपस्या के बाद 35 वर्ष की आयु में वैशाख की पूर्णिमा की रात निरंजना(फल्गु) नदी के किनारे, पीपल वृक्ष के नीचे, सिद्धार्थ को ज्ञान प्राप्त हुआ|


● ज्ञान-प्राप्ति के बाद सिद्धार्थ बुद्ध के नाम से जाने गए| वह स्थान बोधगया कहलाया|
● बुद्ध ने अपना प्रथम उपदेश सारनाथ(ऋषिपतनम) में दिया जिसे बौद्ध ग्रंथों में धर्मचक्रप्रवर्तन कहा जाता है|
● बुद्ध ने अपने उपदेश जनसाधारण की भाषा पालि में दिए|
● बुद्ध ने अपने उपदेश कोशल, वैशाली, कौशांबी एवं अन्य राज्यों में दिए|
● बुद्ध ने अपने सर्वाधिक उपदेश कोशल की राजधानी श्रावस्ती में दिए|
● इनके प्रमुख अनुयायी शासक थे- बिंबिसार प्रसेनजित तथा उदयिन|
● बुद्ध की मृत्यु 80 वर्ष की अवस्था में 483 ईसापूर्व में कुशीनारा(देवरिया, उत्तर प्रदेश) में चुन्द द्वारा अर्पित भोजन करने के बाद हो गयी, जिसे बौद्ध धर्म में महापरिनिर्वाण कहा गया|
● मल्लो ने अत्यंत सम्मानपूर्वक बुद्ध का अंत्येष्टि संस्कार किया|
● एक अनुश्रुति के अनुसार मृत्यु के बाद बुद्ध के शरीर के अवशेषों को 8 भागों में बांट कर उन पर आठ स्तूपों का निर्माण कराया गया|
● बुद्ध के जन्म एवं मृत्यु की तिथि को चीनी परंपरा के कैंटोन अभिलेख के आधार पर निश्चित किया गया है|
● बौद्ध धर्म के बारे में हमें विशद ज्ञान त्रिपिटक(विनयपिटक, सूत्रपिटक व अभिदम्भपिटक) से प्राप्त होता है तीनों पिटको की भाषा पालि है|
● बौद्ध धर्म मूलत: अनीश्वरवादी है| इसमें आत्मा की परिकल्पना भी नहीं है|
● बौद्ध धर्म में पुनर्जन्म की मान्यता है|
● तृष्णा को क्षीण हो जाने की अवस्था को ही बुद्ध ने निर्वाण कहा है|
● "विश्व दुखों से भरा है" का सिद्धांत बुद्ध ने उपनिषद से लिया|
● बुद्ध के अनुयायी दो भागों में विभाजित थे-
1. भिक्षुक- बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए जिन्होंने सन्यास ग्रहण किया, उन्हें भिक्षुक कहा  गया|
2. उपासक- गृहस्थ जीवन व्यतीत करते हुए बौद्ध धर्म अपनाने वालों को उपासक कहा गया|
● बौद्धसंघ में सम्मिलित होने के लिए न्यूनतम आयु सीमा 15 वर्ष थी|
● बौद्ध संघ में प्रविष्टि होने को उपसंपदा कहा जाता था|
● बौद्ध धर्म के त्रिरत्न हैं- बुद्ध, धर्म एवं संघ|
बौद्ध सभाएं
सभा                           समय                 स्थान            अध्यक्ष                शासनकाल
प्रथम बौद्ध संगीति    483 ईसा पूर्व        राजगृह          महाकश्यप               अजातशत्रु
द्वितीय बौद्ध संगीति    383 ईसापूर्व       वैशाली         सबाकामी                कालाशोक
तृतीय बौद्ध संगीति     255 ईसा पूर्व       पाटलिपुत्र      मोग्गलिपुत्त तिस्स    अशोक
चतुर्थ बौद्ध संगीति      ईस्वी की प्रथम      कुंडल वन      वसुमित्र/                 कनिष्क
                                  शताब्दी                                    अश्वघोष

● चतुर्थ बौद्ध संगीति के बाद बौद्ध धर्म दो भागों हीनयान तथा महायान में विभाजित हो गया|
● धार्मिक जुलूस का प्रारंभ सबसे पहले बौद्धधर्म के द्वारा प्रारंभ किया गया| बौद्धों का सबसे पवित्र त्यौहार वैशाख पूर्णिमा है, जिसे बुद्ध पूर्णिमा के नाम से जाना जाता है| इसका महत्व इसलिए है कि बुद्ध पूर्णिमा के दिन बुद्ध का जन्म, ज्ञान की प्राप्ति एवं महापरिनिर्वाण की प्राप्ति हुई|
● बुद्ध ने सांसारिक दुखों के संबंध में चार आर्य सत्यो का उपदेश दिया| ये है-
1. दु:ख 2. दु:ख समुदाय 3. दु:ख निरोध 4. दु:ख निरोधगामिनी प्रतिपदा|
● इन संसारिक दु:खों से मुक्ति हेतु, बुद्ध ने अष्टांगिक मार्ग की बात कही| ये साधन है-
1. सम्यक दृष्टि
2.सम्यक संकल्प
3.सम्यक वाणी
4.सम्यक कर्मान्त
5.सम्यक आजीव
6.सम्यक व्यायाम
7.सम्यक स्मृति
8.सम्यक समाधि
● बुद्ध के अनुसार अष्टांगिक मार्गों के पालन करने के उपरांत मनुष्य के भव तृष्णा नष्ट हो जाती है और उसे निर्वाण प्राप्त हो जाता है|
● निर्वाण बौद्ध धर्म का परम लक्ष्य है, जिसका अर्थ है 'दीपक का बुझ जाना' अर्थात जीवन-मरण चक्र से मुक्त हो जाना| बुद्ध ने निर्वाण प्राप्ति को सरल बनाने के लिए निम्न 10 शीलो पर बल दिया-
1.अहिंसा
2.सत्य
3.अस्तेय(चोरी न करना)
4.अपरिग्रह(किसी प्रकार की संपत्ति ना रखना)
5 .मद्य -सेवन न करना 
6.असमय भोजन ना करना
7.सुखप्रद बिस्तर पर नहीं सोना
8.धन संचय ना करना
9.स्त्रियों से दूर रहना
10.नृत्य-गान आदि से दूर रहना
● बुद्ध ने मध्यम मार्ग का उपदेश दिया|
● अनीश्वरवाद के संबंध में बौद्ध धर्म एवं जैन धर्म में समानता है|
● जातक कथाएं प्रदर्शित करती हैं कि बोधिसत्व का अवतार मनुष्य रूप में भी हो सकता है तथा पशुओं के रुप में भी|
● सर्वाधिक बुद्ध मूर्तियों का निर्माण गंधार शैली के अंतर्गत किया गया लेकिन बुद्ध की प्रथम मूर्ति संभवत: मथुरा कला के अंतर्गत बनी थी|

जैन धर्म/jainism/ For All Govt Exam [cgl, chsl,cpo, tet, police, railway.....etc]

जैन धर्म


● जैन धर्म के संस्थापक एवं प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव थे|
● जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ थे| जो काशी के इक्ष्वाकु वंशीय राजा अश्वसेन के पुत्र थे| इन्होंने 30 वर्ष की अवस्था में सन्यास जीवन को स्वीकारा था| इनके द्वारा दी गई शिक्षा थी-
1.हिंसा न करना
2.सदा सत्य बोलना
3.चोरी न करना
4.संपत्ति न रखना|
● महावीर स्वामी जैन धर्म के 24वें एवं अंतिम तीर्थंकर हुए|
● महावीर का जन्म 540 ईसापूर्व में कुंडग्राम(वैशाली) में हुआ था| इनके पिता सिद्धार्थ ज्ञातृक कुल के सरदार थे और माता त्रिशला लिच्छवि राजा चेटक की बहन थी|
● महावीर की पत्नी का नाम यशोदा एवं पुत्री का नाम अनोज्जाप्रियदर्शिनी था|
● महावीर के बचपन का नाम वर्द्धमान था| इन्होंने 30 वर्ष की उम्र में माता पिता की मृत्यु के पश्चात अपने बड़े भाई नंदिवर्धन से अनुमति लेकर सन्यास जीवन को स्वीकारा था|
● 12 वर्षों की कठिन तपस्या के बाद महावीर को जृम्भीक के समीप ऋजुपालिका नदी के तट पर साल वृक्ष के नीचे तपस्या करते हुए संपूर्ण ज्ञान का बोध हुआ|
● महावीर ने अपना उपदेश प्राकृत भाषा में दिया| महावीर के अनुयायियों को मूलत: निग्रंथ कहा जाता है|
● महावीर के प्रथम अनुयायी उनके दामाद(प्रियदर्शनी के पति) जामिल बने|
● प्रथम जैन भिक्षुणी नरेश दधिवाहन की पुत्री चंपा थी|
● महावीर ने अपने शिष्यों को 11 गणधरों में विभाजित किया था|
● आर्य सुधर्मा अकेला ऐसा गंधर्व था जो महावीर की मृत्यु के बाद भी जीवित रहा और जैन धर्म का प्रथम थेरा या मुख्य उपदेशक हुआ|
● लगभग 300 ईसापूर्व में मगध में 12 वर्षों का भीषण अकाल पड़ा, जिसके कारण भद्रबाहु अपने शिष्यों सहित कर्नाटक चले गए| किंतु कुछ अनुयायी स्थूलभद्र के साथ मगध में ही रुक गए| भद्रबाहु के वापस लौटने पर मगध के साधुओं से उनका गहरा मतभेद हो गया जिसके परिणाम स्वरुप जैन मत श्वेतांबर एवं दिगंबर नामक दो संप्रदायों में बट गया| स्थूलभद्र के शिष्य श्वेतांबर(श्वेत वस्त्र धारण करने वाले) एवं भद्रबाहु के शिष्य दिगंबर(नग्न रहने वाले) कहलाए|
● जैन धर्म के त्रिरत्न है-
1.सम्यक दर्शन
2.सम्यक ज्ञान
3.सम्यक आचरण
● त्रिरत्न के अनुशीलन में निम्न पांच महाव्रतों का पालन अनिवार्य है- अहिंसा, सत्य वचन, अस्तेय, एवं ब्रम्हचर्य
● जैन धर्म में ईश्वर की मान्यता नहीं है|
YouTube पर देखने के लिए क्लिक करें-
https://youtu.be/1dKtfcvzPFE
● जैन धर्म में आत्मा की मान्यता है|
● महावीर पुनर्जन्म एवं कर्मवाद में विश्वास रखते थे|
● जैन धर्म के सप्तभंगी ज्ञान के अन्य नाम स्यातवाद और अनेकांतवाद हैं|
● जैन धर्म ने अपने आध्यात्मिक विचारों को सांख्यदर्शन से ग्रहण किया|
● जैन धर्म मानने वाले कुछ राजा थे- उदायिन, वंदराजा, चंद्रगुप्त मौर्य, कलिंग नरेश खारवेल, राष्ट्रकूट राजा अमोघवर्ष, चंदेल शासक|
● मैसूर के गंग वंश के मंत्री, चामुंड के प्रोत्साहन से कर्नाटक के श्रवणबेलगोला में 10 वीं शताब्दी के मध्य में विशाल बाहुबलि की मूर्ति(गोमतेश्वर की मूर्ति) का निर्माण किया गया|
● खजुराहो में जैन मंदिरों का निर्माण चंदेल शासकों द्वारा किया गया|
● मौर्योत्तर युग में मथुरा जैन धर्म का प्रसिद्ध केंद्र था| मथुरा कला का संबंध जैन धर्म से है|
● जैन तीर्थंकरों की जीवनी भद्रबाहु द्वारा रचित कल्पसूत्र में है|
● 72 वर्ष की आयु में महावीर की मृत्यु(निर्वाण) 468 ईसापूर्व में बिहार राज्य के पावापुरी(राजगीर) में हो गई|
● मल्लराजा सृस्तिपाल के राज प्रसाद में महावीर स्वामी को निर्वाण प्राप्त हुआ|
प्रमुख जैन तीर्थंकर और उनके प्रतीक चिन्ह
जैन तीर्थंकर के नाम एवं क्रम           चिन्ह
ऋषभदेव(प्रथम)                              सांड
अजीतनाथ(द्वितीय)                       हाथी
संभवनाथ(तृतीय)                            घोड़ा
संपार्श्व(सप्तम)                               स्वास्तिक
शांति(सोलहवां)                               हिरण
नामि (21वे )                                   नीलकमल
अरिष्टनेमि(22वे )                            शंख
पार्श्वनाथ( 23वें )                              सर्प
महावीर(24वें )                                  सिंह
जैन संगीतियां
संगीत               वर्ष                 स्थल                     अध्यक्ष
प्रथम        300 ईसा पूर्व       पाटलिपुत्र                   स्थूलभद्र
द्वितीय    छठी शताब्दी      वल्लभी[गुजरात]        क्षमा श्रवण


सिंधु सभ्यता

सिंधु सभ्यता

        ● रेडियो कार्बन c14 जैसी नवीन विश्लेषण पद्धति के द्वारा सिंधु सभ्यता की सर्वमान्य तिथि 2400 ईसा पूर्व से 1700 ईसा पूर्व मानी गई है|
● सिंधु सभ्यता की खोज रायबहादुर दयाराम साहनी ने की थी|
● सिंधु सभ्यता को प्राकऐतिहासिक अथवा कांस्य युग में रखा जा सकता है| इस सभ्यता के मुख्य निवासी द्रविड़ एवं भूमध्यसागरीय थे|
● सिंधु सभ्यता के सर्वाधिक पश्चिमी पुरास्थल दाश्क नदी के किनारे स्थित सुतकांगेडोर(बलूचिस्तान),पूर्वी पुरास्थल हिंडन नदी के किनारे आलमगीरपुर (जिला मेरठ, उत्तर प्रदेश) उत्तरी पुरास्थल चिनाव नदी के तट पर अखनूर के निकट मांदा(जम्मू कश्मीर) तथा दक्षिणी पुरास्थल गोदावरी नदी के तट पर दाइमाबाद (जिला अहमदनगर, महाराष्ट्र)
● सिंधु सभ्यता या सैंधव सभ्यता नगरीय सभ्यता थी|  सैंधव सभ्यता से प्राप्त परिपक्व अवस्था वाले स्थलों में केवल 6 को ही बड़े नगर की संज्ञा दी गई है;  मोहनजोदड़ो, हड़प्पा, गणवारीवाला, धौलावीरा, राखीगढ़ी एवं कालीबंगन|
● स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात हड़प्पा संस्कृति के सर्वाधिक स्थल गुजरात में खोजे गए हैं|
● लोथल एवं सूतकोतदा - सिंधु सभ्यता का बंदरगाह था|
● जूते हुए खेत और नक्काशीदार ईंटों के प्रयोग का साक्ष्य कालीबंगन से प्राप्त हुआ है|
● मोहनजोदड़ो से प्राप्त अन्नागार  संभवता सेंधव सभ्यता की सबसे बड़ी इमारत है
● मोहनजोदड़ो से प्राप्त वृहत स्नानागार एक प्रमुख स्मारक है, जिस के मध्य स्थित स्नान कुंड 11.88 मीटर लंबा, 7.0 1 मीटर चौड़ा, एवं 2.43 मीटर गहरा है|
● अग्निकुंड लोथल एवं कालीबंगन से प्राप्त हुए हैं|
● मोहनजोदड़ो से प्राप्त एक शील पर तीन मुख वाले देवता(पशुपतिनाथ) की मूर्ति मिली है| उनके चारों ओर हाथी, गेंडा, चीता एवं भैंसा विराजमान है|
● मोहनजोदड़ो से नर्तकी की एक कांस्य मूर्ति मिली है|
● हड़प्पा की मुहरों पर सबसे अधिक एक श्रृंगी पशु का अंकन मिलता है|
● मनके बनाने के कारखाने लोथल एवं चन्हूदड़ो  में मिले हैं|
● सिंधु सभ्यता की लिपि भाव चित्रात्मक है| यह लिपि दाईं से बाईं ओर लिखी जाती थी| जब अभिलेख एक से अधिक पंक्तियों का होता था तो पहली पंक्ति दाएं से बाएं और दूसरी बाएं से दाएं ओर लिखी जाती थी|
● सिंधु सभ्यता के लोगों ने नगरों तथा घरों के विन्यास के लिए ग्रीड पद्धति अपनाई|
● घरों के दरवाजे और खिड़कियां सड़क की ओर ना खुलकर पिछवाड़े की ओर खुलते थे| केवल लोथल नगर के घरों के दरवाजे मुख्य सड़क की ओर खोलते थे|
● सुरकोरदा, कालीबंगन एवं लोथल से सेंधवकालीन घोड़े के अस्थिपंजर मिले हैं|
● सिंधु सभ्यता में मुख्य फसल गेहूं और जौ |
● सिंधु वासी मिठास के लिए शहद का प्रयोग करते थे|
● रंगपुर एवं लोथल से चावल के दाने मिले हैं, जिनसे धान की खेती होने का प्रमाण मिलता है| चावल के प्रथम साक्ष्य लोथल से ही प्राप्त हुए हैं|
● तौल की इकाई संभवत: 16 के अनुपात में थी|
● सैंधव सभ्यता के लोग यातायात के लिए दो पहियों एवं चार पहियों वाली बैलगाड़ी या भैंसा गाड़ी का उपयोग करते थे|
● मेसोपोटामिया के अभिलेखों में वर्णित मेलूहा शब्द का अभिप्राय सिंधु सभ्यता से ही है|
● संभवत: हड़प्पा संस्कृति का शासन वणिक वर्ग के हाथों में था|
● पिग्गट  ने हड़प्पा एवं मोहनजोदड़ो को एक विस्तृत साम्राज्य की जुड़वा राजधानी कहां है|
● सिंधु सभ्यता के लोग धरती को उर्वरता की देवी मानकर उसकी पूजा किया करते थे|
● वृक्ष पूजा एवं शिव पूजा के प्रचलन के साक्ष्य भी सिंधु सभ्यता से मिलते हैं|
● स्वास्तिक चिन्ह संभवत: हड़प्पा सभ्यता की देन है| इस चिन्ह से सूर्योपासना का अनुमान लगाया जाता है| सिंधु घाटी के नगरों में किसी भी मंदिर के अवशेष नहीं मिले हैं|
● सिंधु सभ्यता में मातृ  देवी की उपासना सर्वाधिक प्रचलित थी|
● पशुओं में कूबड़ वाला सांड़  इस सभ्यता के लोगों के लिए विशेष पूजनीय था|
● स्त्री मृण्मूर्तियां अधिक मिलने से ऐसा अनुमान लगाया जाता है कि सैंधव समाज मातृसत्तात्मक था|
● सिंधु वासी सूती  एवं ऊनी वस्त्रों का प्रयोग करते थे|
● मनोरंजन के लिए सेंधव वासी मछली पकड़ना,  शिकार करना, पशु पक्षियों को आपस में लड़ाना, चौपड़ और पासा खेलना आदि साधनों का प्रयोग करते थे|
● सिंधु सभ्यता के लोग काले रंग से डिजाइन किए हुए लाल मिट्टी के बर्तन बनाते थे|
● सिंधु घाटी के लोग तलवार से परिचित नहीं थे|
● कालीबंगन एकमात्र हड़प्पाकालीन स्थल था, जिसका निचला शहर भी किले से घिरा हुआ था| कालीबंगन का अर्थ है काली चूड़ियां| यहां से पूर्व हड़प्पा स्तरो के खेत जोते जाने के और अग्नि पूजा की प्रथा के प्रमाण मिले हैं|
● पर्दा प्रथा एवं वेश्यावृत्ति सिंधु सभ्यता में प्रचलित थी|
● शव को जलाने एवं गाड़ने वाली दोनों प्रथाएं प्रचलित थी| हड़प्पा में शव को दफनाने जबकि मोहनजोदड़ो में जलाने की प्रथा विद्यमान थी| लोथल एवं कालीबंगा में युग्म  समाधियां मिली है|
● सैंधव सभ्यता के विनाश का संभवत सबसे प्रभावी कारण बाढ़ था|
● आग में पकी हुई मिट्टी को टेराकोटा कहा जाता है|

सैंधव  सभ्यता के प्रमुख स्थल: नदी, उत्खनन कर्ता एवं वर्तमान स्थिति 

             

प्रागैतिहासिक काल

प्रागैतिहासिक काल


● जिस काल में मनुष्य ने घटनाओं का कोई लिखित विवरण उद्धृत नहीं किया, उसे `प्रागैतिहासिक काल' कहते हैं| मानव विकास के उस काल को इतिहास कहा जाता है, जिसका विवरण लिखित रूप में उपलब्ध है|
● `आद्य ऐतिहासिककाल' उस काल को कहते हैं, जिस काल में लेखन-कला के प्रचलन के बाद उपलब्ध लेख पढ़ें नहीं जा सके हैं|
● `ज्ञानी मानव'(होमोसेपियंस) का प्रवेश इस धरती पर आज से लगभग 30या40 हजार वर्ष पूर्व हुआ|
● `पूर्व पाषाण युग' के मानव की जीविका का मुख्य आधार था- शिकार|
● आग का आविष्कार पुरा-पाषाण काल में एवं पहिए का नव-पाषाण काल में हुआ|
● मनुष्य में स्थाई निवास की प्रवृत्ति नवपाषाण काल में हुई तथा उसने सबसे पहले कुत्ता को पालतू बनाया|
● मनुष्य ने सर्वप्रथम तांबा धातु का प्रयोग किया तथा उसके द्वारा बनाए जाने वाला प्रथम औजार कुल्हाड़ी था|
● कृषि का आविष्कार नवपाषाण काल में हुआ| प्रागैतिहासिक अन्न उत्पादक स्थल मेहरगढ़ पश्चिमी बलूचिस्तान में अवस्थित है| कृषि के लिए अपनाई गई सबसे प्राचीन फसल गेहूं एवं जौ  थी|
● कृषि का प्रथम उदाहरण मेहरगढ़ से प्राप्त हुआ है| कोल्डीहवा का संबंध चावल के प्राचीनतम साक्ष्य से है|
● पल्लावरम नामक स्थान पर प्रथम भारतीय पुरापाषाण कलाकृति की खोज हुई थी|
● भारत में पूर्व प्रस्तर युग के अधिकांश औजार स्फटिक(पत्थर) के बने थे|
● रॉबर्ट ब्रूस फुट पहले व्यक्ति थे जिन्होंने 1863 ईस्वी में भारत में पुरापाषाण कालीन औजारों की खोज की|
● भारत का सबसे प्राचीन नगर मोहनजोदड़ो था, सिंधी भाषा में जिसका अर्थ है मृतकों का टीला|
● असम का श्वेतभ्रू गिबन भारत में पाया जाने वाला एकमात्र मानवाभ कपि है|
● इनामगांव ताम्र पाषाण युग की एक बड़ी बस्ती थी| इसका संबंध जोर्वे संस्कृति से है|
● भारत में शिवालक की पहाड़ी से जीवाश्म का प्रमाण मिला है|
● भारत में मनुष्य संबंधी सबसे पहला प्रमाण नर्मदा घाटी में मिला है|
संस्कृति                        बर्तन
मालवा                          काला तथा लाल
बुर्जहोम                        धूसर
जोखे                             लाल
दक्षिणी नवपाषाण           चमकीला धूसर
पूर्वी नवपाषाण                भूरालाल

भारत का इतिहास

भारत का परिचय-

   उत्तर में हिमालय से लेकर दक्षिण में समुद्र तक फैला यह उपमहाद्वीप भारतवर्ष के नाम से ज्ञात है, जिसे महाकाव्य तथा पुराणों में `भारतवर्ष' अर्थात् `भरत का देश' तथा यहां के निवासियों को भारतीय अर्थात् भरत की संतान कहा गया है| यूनानियों ने भारत को इंडिया तथा मध्यकालीन मुस्लिम इतिहासकारों ने हिंदु तथा  हिंदुस्तान के नाम से संबोधित किया है| भारतीय इतिहास को अध्ययन की सुविधा के लिए तीन भागों में बांटा गया है- प्राचीन भारत, मध्यकालीन भारत एवं आधुनिक भारत|

प्राचीन भारत

1. प्राचीन भारतीय इतिहास के स्रोत    

प्राचीन भारतीय इतिहास के विषय में जानकारी मुख्यतः चार स्त्रोतों से प्राप्त होती है-
1- धर्म ग्रंथ 2- ऐतिहासिक ग्रंथ 3- विदेशियों का विवरण 4- पुरातत्व संबंधी साक्ष्य

धर्म ग्रंथ एवं ऐतिहासिक ग्रंथ से मिलनेवाली महत्वपूर्ण जानकारी

● भारत का सर्व प्राचीन धर्म ग्रंथ वेद है जिसके संकलनकर्ता महर्षि कृष्ण द्वैपायन वेद व्यास को माना जाता है| वेद चार हैं- ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद एवं अथर्ववेद|
ऋग्वेद
● ऋचाओ क्रमबद्ध ज्ञान के संग्रह को ऋग्वेद कहा जाता है| इसमे 10 मंडल, 1028 सूक्त एवं 10,462 ऋचाऐ  है| इस वेद के ऋचाऐ को पढ़ने वाले ऋषि को होतृ   कहते हैं|
● विश्वामित्र द्वारा रचित ऋग्वेद के तीसरे मंडल में सूर्य देवता सावित्री को समर्पित प्रसिद्ध गायत्री मंत्र है| इस के नौवें मंडल में देवता सोम का उल्लेख है|
● इसके आठवीं मंडल की हस्तलिखित ऋचाऐ को खिल कहा जाता है|
● चातुर्वर्ण्य समाज की कल्पना का आदी स्रोत ऋग्वेद के दसवें मंडल में वर्णित पुरुष सूक्त  है, जिनके अनुसार चार वर्ण (ब्राम्हण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र) आदि पुरुष ब्रह्मा के क्रमशः मुख,  भूजाओ, जांघ और चरणों से उत्पन्न हुए|
● वामनावतार के 3 पदों के आख्यान का प्राचीनतम स्रोत ऋग्वेद है|
● ऋग्वेद में इंद्र के लिए 250 तथा अग्नि के लिए 200 ऋचाओ की रचना की गई है|
● सबसे पुराना वेद ऋग्वेद ही है|

यजुर्वेद
● सस्वर पाठ के लिए मंत्र तथा बली के समय अनुपालन के लिए नियमों का संकलन यजुर्वेद कहलाता है इसके पाठक करता को अध्वर्यु कहते  हैं|
●  यह एक ऐसा वेद है जो गद्य एवं पद्य दोनों में है|
सामवेद
● यह गाए जा सकने वाली ऋचाओ का संकलन है इसके पाठक करता को उद्रातृ कहते हैं|
● इसे भारतीय संगीत का जनक कहा जाता है|
अथर्ववेद
● अथर्व ऋषि द्वारा रचित इस वेद में रोग निवारण, तंत्र मंत्र, जादू टोना, शाप, वशीकरण, आशीर्वाद स्तुति, प्रायश्चित औषधि, अनुसंधान, विवाह प्रेम, राज कर्म, मातृभूमि-महात्मय आदि विविध विषयों से संबंध मंत्र तथा सामान्य मनुष्य के विचारों, विश्वासों, अंधविश्वासों, इत्यादि का वर्णन है| अथर्ववेद कन्याओं के जन्म की निंदा करता है|
● इसमें सभा एवं समिति को प्रजापति की दो पुत्रियां कहा गया है|
नोट- सबसे प्राचीन वेद ऋग्वेद एवं सबसे बाद का वेद अथर्ववेद है|

पुराण                      संबंधित वंश
विष्णु पुराण                   मौर्य वंश
मत्स्य पुराण         आंध्र सातवाहन
वायु पुराण                    गुप्त वंश
● वेदों को भली भांति समझने के लिए 6 वेदांगों की रचना हुई|( शिक्षा, ज्योतिष, कल्प, व्याकरण, निरुक्त तथा छंद)
● भारतीय ऐतिहासिक कथाओं का सबसे अच्छा क्रमबद्ध विवरण पुराणों में मिलता है| इसके रचयिता लोमहर्ष तथा उनके पुत्र उग्रश्रवा माने जाते हैं| इनकी संख्या 18 है जिनमें से केवल 5- मत्स्य, वायु, विष्णु, ब्राम्हण एवं भागवत में ही राजाओं की वंशावली पाई जाती है|
नोट-पुराणों में मत्स्य पुराण सबसे प्राचीन एवं प्रामाणिक है|
● अधिकतर पुराण सरल संस्कृत श्लोक में लिखे गए हैं| स्त्रियां तथा शूद्र जिन्हें वेद पढ़ने की अनुमति नहीं थी, वह सभी पुराण सुन सकते थे| पुराणों का पाठ पुजारी मंदिरों में किया करते थे|
● स्त्री की सर्वाधिक गिरी हुई स्थिति मैत्रेयनी संहिता से प्राप्त होती है जिसमें जुआ और शराब की भांति स्त्री को पुरुष का तीसरा मुख्य दोष बताया गया है|
● शतपथ ब्राह्मण में स्त्री को पुरुष का अर्धांगिनी कहा गया है|
● स्मृति ग्रंथों में सबसे प्राचीन एवं प्रमाणित मनुस्मृति मानी जाती है| यह शुंग काल का मानक ग्रंथ है|
● जातक में बुद्ध के पूर्व जन्म की कहानी वर्णित है| हीनयान का प्रमुख ग्रंथ कथावस्तु है| जिसमें महात्मा बुद्ध का जीवन चरित्र अनेक कथानकों के साथ वर्णित है|
● जैन साहित्य को आगम कहा जाता है| जैन धर्म का प्रारंभिक इतिहास `कल्पसूत्र' से ज्ञात होता है| जैन ग्रंथ भगवती सूत्र में महावीर के जीवन कृत्यो तथा अन्य समकालीको के साथ उनके संबंधों का विवरण मिलता है|
● अर्थशास्त्र के लेखक चाणक्य हैं यह 15 अधिकरणों एवं 180 प्रकरणों में विभाजित है इसमें मौर्यकालीन इतिहास की जानकारी प्राप्त होती है|
● संस्कृत साहित्य में ऐतिहासिक घटनाओं को क्रमबद्ध लिखने का सर्व प्रथम प्रयास कल्हण के द्वारा किया गया| कल्हण द्वारा रचित पुस्तक राज तरंगिणी है, जिसका संबंध कश्मीर के इतिहास से है|
● अरबों की सिंध विजय का वृतांत चचनामा में सुरक्षित है|
●  अष्टाध्यायी  के लेखक पाणिनि है| इससे मौर्य के पहले का इतिहास तथा मौर्य युगीन राजनीतिक अवस्था की जानकारी प्राप्त होती है|
● कात्यायन की गार्गी संहिता एक ज्योतिष ग्रंथ है फिर भी इसमें भारत पर होने वाले यवन आक्रमण का उल्लेख मिलता है|
● पतंजलि पुष्यमित्र शुंग के पुरोहित थे इनके महाभाष्य से शुंग के इतिहास का पता चलता है|

विदेशी यात्रियों से मिलने वाली प्रमुख जानकारी

A.यूनानी-रोमन लेखक
1.टेसियस:यह ईरान का राज वैध था| भारत के संबंध में इसका विवरण आश्चर्यजनक कहानियों से परिपूर्ण होने के कारण और विश्वसनीय है|
2.हेरोडोटस:इसे इतिहास का पिता कहा जाता है| इसने अपनी पुस्तक हिस्टोरिका में पांचवी शताब्दी ईसा पूर्व के भारत-फारस के संबंध का वर्णन किया है| परंतु इसका विवरण भी अनुश्रुतियों एवं अफवाहों पर आधारित है|
3.सिकंदर के साथ आने वाले लेखकों में niryakas,anesikritas,asitobulas के विवरण अधिक प्रमाणिक एवं विश्वसनीय है|
4.मेगास्थनीज:यह सेल्यूकस निकेटर का राजदूत था, जो चंद्रगुप्त मौर्य के राज दरबार में आया था| इसने अपनी पुस्तक इंडिका में मौर्य युगीन समाज एवं संस्कृति के विषय में लिखा|
5.dayonisiyas:यह मिश्र नरेश तालमी फिलाडेल्फस का राजदूत था जो अशोक के राज दरबार में आया था|
6.डाईमेकस:यह सीरियन नरेश antiyokas का राजदूत था, जो बिंदुसार के राज दरबार में आया था| इसका विवरण भी मौर्य-युग से संबंधित है|
7.टॉलमी:इसने दूसरी शताब्दी में भारत का भूगोल नामक पुस्तक लिखी|
8.प्लिनी:इसने प्रथम शताब्दी में नेचुरल हिस्ट्री नामक पुस्तक लिखी इसमें भारतीय पशुओं, पेड़-पौधों, खनिज पदार्थों, आदि के बारे में विवरण मिलता है|

B. चीनी लेखक
1. फाहियान: यह चीनी यात्री गुप्त नरेश चंद्रगुप्त द्वितीय के राज दरबार में आया था| इसने अपने विवरण  में  मध्यप्रदेश के समाज एवं संस्कृति के बारे में वर्णन किया है| इसने मध्य प्रदेश की जनता को सुखी एवं समृद्ध बताया है|
2. संयुगन: यह 518 ई में भारत आया| इसने अपनी 3 वर्षों की यात्रा में बौद्ध धर्म की प्राप्ति या एकत्रित की|
3. व्हेन सॉन्ग: यह हर्षवर्धन के शासनकाल में भारत आया था| व्हेन सॉन्ग609 ई में चीन से भारत वर्ष के लिए प्रस्थान किया और लगभग 1वर्ष की यात्रा के बाद सर्वप्रथम वह भारत राज्य कपिशा पहुंचा| भारत में 15 वर्षों तक ठहरकर 645 ईसवी में चीन लौट गया| वह बिहार में नालंदा जिला स्थित नालंदा विश्वविद्यालय में अध्ययन करने तथा भारत से बौद्ध ग्रंथों को एकत्रित कर ले जाने के लिए आया था| इसका भ्रमण वृतांत सि-यू-की नाम से प्रसिद्ध है,जिसमें 138 देशों का विवरण मिलता है| इसने हर्ष कालीन समाज, धर्म तथा राजनीति के बारे में वर्णन किया है| इसके अनुसार सिंध का राजा शूद्र था|
नोट- व्हेन सॉन्ग के अध्ययन के समय नालंदा विश्वविद्यालय के कुलपति आचार्य शीलभद्र थे|
4. इत्सिंग: यह सातवीं शताब्दी के अंत में भारत आया था| इसने अपने विवरण में नालंदा विश्वविद्यालय, विक्रमशिला विश्वविद्यालय तथा अपने समय के भारत का वर्णन किया है|
C. अरबी लेखक
1. अलबरूनी: यह महमूद गजनवी के साथ भारत आया था| अरबी में लिखी गई उसकी कृति `किताब-उल-हिंद' या `तहक़ीक़-ए-हिंद (भारत की खोज)' आज भी इतिहासकारों के लिए एक महत्वपूर्ण स्रोत है|
2. इब्नबतूता: इसके द्वारा अरबी भाषा में लिखा गया उसका यात्रा वृतांत जिसे  रिहला कहा जाता है, चौदहवीं शताब्दी में भारत उपमहाद्वीप के सामाजिक तथा सांस्कृतिक जीवन के विषय में बहुत ही प्रचुर तथा सबसे रोचक जानकारियां देता है| 1333 ई में दिल्ली पहुंचने पर इसकी विद्वता से प्रभावित होकर सुल्तान मोहम्मद बिन तुगलक ने उसे दिल्ली का काजी या न्यायाधीश नियुक्त किया|
D. अन्य लेखक
1. तारानाथ: यह एक तिब्बती लेखक था| इसने कंग्युर तथा तंग्युर नामक ग्रंथ की रचना की|  इनसे भारतीय इतिहास के बारे में जानकारी मिलती है| 
2. मार्को पोलो: यह 13 वी शताब्दी के अंत में पांड्य देश की यात्रा पर आया था| इसका विवरण पांड्य इतिहास के अध्ययन के लिए उपयोगी है|

पुरातत्व संबंधी साक्ष्य से मिलने वाली जानकारी
● 1400 ईसा पूर्व के अभिलेख `बोगाज-कोई' (एशिया माइनर) से वैदिक देवता मित्र, वरुण, इंद्र और नासत्य के नाम मिलते हैं|
● मध्य भारत में भागवत धर्म विकसित होने का प्रमाण यवन राजदूत 'होलियोडोरस' का बेसनगर (विदिशा) गरुड़ स्तंभ लेख से प्राप्त होता है|
● सर्वप्रथम भारतवर्ष का जिक्र हाथीगुंफा अभिलेख में है|
● सर्वप्रथम दुर्भिक्ष का जानकारी देने वाला अभिलेख सोहगौरा अभिलेख है|
● सर्वप्रथम भारत पर होने वाले हुण आक्रमण की जानकारी भीतरी स्तंभ लेख से प्राप्त होती है|
● सती प्रथा का पहला लिखित साक्ष्य एरण अभिलेख (शासक भानुगुप्त) से प्राप्त होती है|
● रेशम बुनकर की श्रेणियों की जानकारी मंदसौर अभिलेख से प्राप्त होती है|
● कश्मीरी नवपाषाण इक पुरास्थल बुर्जहोम से गर्त आवास का साक्ष्य मिला है| इनमें उतरने के लिए सीढ़ियां होती थी|
● प्राचीनतम सिक्को को आहत सिक्के कहा जाता है, इसी को साहित्य में काषाणर्पण कहा गया है|
● सर्वप्रथम सिक्कों पर लेख लिखने का कार्य यवन शासकों ने किया|
● समुद्रगुप्त की वीणा बजाती हुई मुद्रा वाले सिक्के से उसके संगीतप्रेमी होने का प्रमाण मिलता है|
● अरिकमेडु (पुदुचेरी के निकट) से रोमन सिक्के प्राप्त हुए हैं|

                         अभिलेख                         
  महत्वपूर्ण अभिलेख                                   शासक
हाथी गुंफा अभिलेख           कलिंग राजा खारवेल
जूनागढ़ अभिलेख                               रुद्रदामन
नासिक अभिलेख                        गौतमी बालश्री
प्रयाग स्तंभ लेख                                समुद्रगुप्त
ऐहोल अभिलेख                               पुलकेशिन-2
मंदसौर अभिलेख            मालवा नरेश यशोवर्मन
ग्वालियर अभिलेख                       प्रतिहार नरेश 
जूनागढ़ अभिलेख                              स्कंद गुप्त
 नोट- अभिलेखों का अध्ययन ईपीग्राफी कहलाता है |